Talent in our villages

https://youtu.be/AXQ67LZftfw

हुनर हमारे गांव में

Our villages are brimming with talent

कितनी सदियों से हुनर बैठा है हमारे गांव में डेरा जमाये ,
की कोई उसको पहचाने , कोई उसके पास आये ,
चुप चाप उसकी कारीगरी से वह रोज़ की चीज़े बनता है ,
कतरनों से, पुराने कपड़ों से खेलना उसको खूब आता है,
वह नहीं भटकता बाज़ारों में,
शहर के लोगों सा नहीं है उसका हाल,
नहीं चाहिए उसको इतने पैसे, नहीं बनना उसको मालामाल,
उसको हर चीज़ बनानी आती है ,
चादर, दरी , मुड़ी , चारपाई,
कितनी बार बैठने के लिए उसने कुर्सी तक भी बनाई ,
पर वह अपनी इन रचनाओं का नहीं करता प्रचार,
जब वक़्त आता है तो वह बना लेता है कितने ही स्वादिष्ट अचार
संतुष्ट है वह, उसकी रचनाओं से उसका काम चलजाता है ,
खुद्दार है वह, किसी के सामने हाथ नहीं फैलाता है,
ऐसे देसी हुनर को छोड़कर हम विदेशी अपनाते हैं,
अपने गावों में बसी कला को क्यों नहीं आगे बढ़ाते हैं ?
अब की बार एक नए गाँव में छुटियाँ बनाने आना,
यहाँ से कुछ नए अनुभव, नयी चीज़ें और बहुत सारा प्यार ले जाना,
चूल्हे की रोटी, ताज़ी छाछ और माखन का स्वाद,
एक बार खाओगे, बरसों तक रहेगा याद,..
आओ , बनो हमारे मेहमान,
अपने देशकी मिटटी से फिर करो दोस्ती, फिर करो पहचान !
शैलजा सिंह

Our villages have tons of talent,
But we with out eyes blinded by western creations, modernity fail to see it or appreciate it…

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